सोमवार, फ़रवरी 18, 2013

.........बेकाबू किसी समंदर सी

मेरी एक रचना सादर पेश है


मुझ सी थी फितरत उनकी, अंजाम भी मुझ सा होना था 
परदे में रहे जज्बे ओ ज़ख्म, बस चुपके से ही रोना था 

ख्वाहिशें तो मचलती ही रहीं बेकाबू किसी समंदर सी 
उनकी किस्मत में कहाँ साहिल पे रुक के सोना था 

एक नक्शा था जो कब का आसुओं में धुल गया
तेरे दर तक फिर भला कहाँ से जाना होना था

अपने नसीब में जब थी ही नहीं तेरे रुख की धूप
दिल में बोई फसल का बरबाद हश्र ही होना था

वाह री तकदीर की लिखाई का ऐसा गज़ब हाल
तुझको पाने से पहले ही लिखा तुझको खोना था 

बुधवार, फ़रवरी 13, 2013


मेरी एक रचना 


इजहारे-मोहोब्बत क्या किसी दिन का मोहताज़ है?
अपनी नज़र  में तो इश्क का हरेक पल ख़ास है 

किसी दास्ताने-इश्क से करे रश्क कोई क्यूं 
जो था नसीब वाला तू उसी के पास है 

मुसलसल रहेगा इधर वफाओं का सिलसिला 
अगरचे उधर से सदाओं की न कोई आस है 

हर लम्हा तिरा ज़िक्र ओ उस पे हजारों अश्क 
फिर नहीं है बुझती, अजब सी ये प्यास है 

ख्यालों की भी बज़्म कब की है उठ चुकी 
फिर भी लगे है वहाँ किसी का तो वास है